आत्म-कल्याण एवं समाधि जगत् में लोग कषाय के वश होकर, कोई विष सेवन करके मरता है, कोई पानी में डूबकर मरता है, कोई फाँसी लगाता है — ये सब मरण अपघात हैं, आत्म-हत्या हैं। जीवन के अन्त में, आत्म-कल्याण की भावनापूर्वक, उपसर्ग आने पर, जिसका उपचार न हो सके ऐसा रोग होने पर, अकाल पड़ने पर, या अन्य कोई मृत्यु का कारण उपस्थित होने पर जो सल्लेखना पूर्वक प्राणों का त्याग किया जाता है, वह समाधि है। जैन धर्म जहाँ जन्म पर महोत्सव मनाता है, वहीं मृत्यु (सल्लेखना) समाधि को भी महोत्सव के रूप में मनाता है। मृत्यु महोपकारी भयमुक्त जीवन: मृत्यु से भयभीत नहीं होना चाहिए। मृत्यु महा-उपकारी होती है। आत्मा का अमरत्व: मृत्यु के उपरांत नवीन शरीर प्राप्त होता है। आत्मा की मृत्यु नहीं होती है; मृत्यु मात्र भव परिवर्तन है, देह परिवर्तन है। दृष्टांत: जैसे व्यक्ति जीर्ण-शीर्ण (पुराने) वस्त्रों को, नवीन वस्त्र प्राप्त होने पर प्रसन्नतापूर्वक छोड़ देता है, उसी प्रकार धर्मात्मा, सज्जन, साधु-जन जीवन के अन्त समय में देह को प्रसन्नतापूर्वक छोड़ देते हैं। मृत्यु महा-उपकारी है, क्योंकि वह नवीन भव प्रदान करती है। उत्तम गति का मार्ग जहाँ गुरु का पादमूल हो, गुरुवाणी खिर रही हो, प्रभु का बिम्ब हो, सिद्धान्त शास्त्र हों, यतियों का समूह हो... वहाँ यदि मृत्यु होती है, तो भव्य जीव की उत्तम गति होती है।