दिल्ली, ऋषभोदय में विराजित दिगम्बर जैन श्रमण-संस्कृति के उन्नायक
Pratham Jhalak News
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पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने धर्म-सभा में सम्बोधन करते हुए कहा कि—
संयम जीवन का श्रृंगार
मनुष्य-जीवन का श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठ कोई श्रृंगार है, वह शील-संयम है। संयम सुर-दुर्लभ है। संयम के लिए स्वर्ग के देव भी तरसते हैं। महा-पुरुष ही संयम को धारण कर शांति के पथिक बनते हैं। संयम सुख का साधन है। संयमी स्व-पर का कल्याणकारी होता है। प्राणियों की रक्षा करना प्राणी-संयम है, इन्द्रियों के भोगों से विरक्त होना, इन्द्रिय-संयम है।
संसार भ्रमण से बचो, भव समुद्र पार करो
अनादि काल से संसारी प्राणी अविद्या, मोह, राग-द्वेष के वश, दुःखी होता हुआ संसार-समुद्र में गोते लगा रहा है एवं मनुष्य देह, नरक एवं तिर्यंच सभी चतुर्गति में कष्ट प्राप्त करते हुए भ्रमण कर रहा है।
शाश्वत-सुख-शांति, आनंद प्राप्त करना है तो राग-द्वेष छोड़कर यथार्थ तत्त्व-बोध करके, आत्मशोध का पुरुषार्थ करना चाहिए। शांति चाहिये तो संसार भ्रमण से बचो, भव समुद्र से पार होकर, आवागमन पर विराम करो।
भगवत्-भक्ति, सुखों की दातार
प्रभु भक्ति से ही पुण्य वर्धमान होता है। प्रभु भक्ति से पाप का क्षय होता है। प्रभु भक्ति आनंद प्रदान करती है। भक्ति ही मुक्ति का आधार है। प्रभु भक्ति से ही संसार के सर्व-सुख प्राप्त होते हैं